Saturday, March 31, 2018

चाटुकारिता

ना कोई फ़ीस लगती है ना कोई
सिफारिश लगती है.
चाटुकारिता की शिक्षा बिल्कुल मुफ़्त में मिलती है.

शिल्पा रोंघे

Wednesday, March 28, 2018

जाग उठता है बचपन जब

जाग उठता है दिल का बचपन
कभी कभी, जरा हो जा अब तू भी चालक
क्योंकि अब दुनिया हो चली है काफी
समझदार, उतनी जितना तू समझ भी
ना सके.

शिल्पा रोंघे

Tuesday, March 27, 2018

चलो कुछ यूं कर लें

चलो आज खुद को ज़रा कम थकाया जाए,
क्यों ना गैस पर तवे की बजाए प्रेशर कुकर
चढ़ाया जाए.
रोटी के सेंकने के बजाए चावल पकाया जाए.
शिल्पा रोंघे

किस्सा कुर्सी का

किस्सा कुर्सी का

यूं  तो दिखती है बेजान सी,
लेकिन गजब खेल है कुर्सी का,
चाहे दफ़्तर की हो या राजनीति की.

रिश्ते नाते, यारी और दोस्ती भूलाकर  आगे बढ़ने की होड़ में है रहती.

यूं रहती ठहरी एक जगह पर.
लेकिन चाल है इसकी चीते की तरह तेज सी.

वैसे तो मेहमान नवाज़ी के लिए अस्तित्व में आई ये बेचारी सी कुर्सी.

लेकिन कुछ स्वार्थों के चलते
राजगद्दी का दर्जा पा गई.

यूं  तो है मामूली सी दिखने वाली
लेकिन रखी है जिस जगह पर
उस आधार पर महत्वपूर्ण है बन जाती.

शिल्पा रोंघे

Saturday, March 24, 2018

राम नवमी

राम नवमी पर

कल्पना रामराज्य की मुश्किल है कलियुग में.
त्रेतायुग में था,
कलियुग में भी है.
रावण कल भी था,
और आज भी  है.
फ़र्क तो है बस इतना सा,
पहले वो खुद था तो
अब उसका अस्तित्व
गरीबी, भ्रष्टाचार, अहंकार, हिंसा,काम और क्रोध
में सिमट गया.
लेकिन पाप पर पुण्य  की विजय
को कौन टाल सका है भला.
हे राम तुम्हारा अस्तित्व कल भी था
और आज भी है.

शिल्पा रोंघे

Thursday, March 22, 2018

मोहब्बत का तराज़ू

इतना भी ना तौलों मोहब्बत के तराज़ू
में किसी को, कि इक दिन तुमसे ज्यादा
सामने वाले का पलड़ा भारी हो जाए.

शिल्पा रोंघे
हर चमकने वाली चीज़
सोना नहीं होती 
मानते है ये सभी 
पर सच है ये भी 
की सबसे चमकदार 

हीरा खदानों
में पड़ा रहता है
बरसों से यूूं ही
छिपा कहीं.

शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...