Thursday, March 12, 2020

दिलाते रहिए याद खुद को

दिलाते रहिए याद खुद को
कि खुशियां आपकी मोहताज़ नहीं
किसी इंसान, किसी ओहदे, किसी वक्त,
किसी जगह की।
हां मुश्किल तो है अमल में लाना  लेकिन ये नामुमकिन भी नहीं।

शिल्पा रोंघे

Friday, March 6, 2020

स्त्री दिवस के लिए


मैं इंतज़ार करुंगी खुशी की लहरों का।
मन के साहिल पे।

मैं खड़ी रहूंगी कड़ी धूप में भी
आनंद के बीजों के अंकुरण के होने तक।

अपने आंचल में समेट लुंगी
खट्टे मीठे कड़वे सभी
क्षणों की स्मृतियों को
फिर जड़ दूंगी उन्हें
अपने जीवन रूपी फ्रेम में।

गर्व है मुझे स्त्री होने का
क्योंकि ये शब्द किसी तोहफ़े
क्या कम है।

शिल्पा रोंघे

Thursday, March 5, 2020

अजनबी कौन हो तुम

पता नहीं कौन हो तुम मेरे
और मैं तुम्हारी ?
बस इतना तय है कि भूल जाती हूं मैं
ज़माने भर के गम देखकर तुम्हें।    

शिल्पा रोंघे

Tuesday, March 3, 2020

निर्भया के अपनों की पीड़ा व्यक्त करती कविता-


निर्भया के अपनों की पीड़ा व्यक्त करती कविता-

तारीख कभी टलती है तो कभी बढ़ती है।
ना जाने कब रुकेगा ये दर्द का सिलसिला।
आंसुओं से डबडबाई आंखें उसकी पूछती है
कि अब और कितनी निर्भया ?

शिल्पा रोंघे

Thursday, January 16, 2020

वक्त का तकाज़ा


वक्त वही है, जो था.
राहें वही हैं, जो थी.
मंज़िले भी वही हैं, जो थी,
मुकाबला मेरा बस मुझ से था और है,
कल से बेहतर आज और आज से बेहतर कल बनूं,
ना किसी से होड़ ना किसी से शिकवा रखूं,
उम्मीदों का दिया अंधेरी गलिया दिखे जहां,
बस रखने का उसे मौका ना खो दूं.
काश मैं खुद को ये हर बार याद दिलाती रहूं.

शिल्पा रोंघे





मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...