Friday, May 8, 2020

राजनीति

साम, दाम, दंड, भेद अनंतकाल से राजनीति की बुनियाद रहा है,

उस पर उग आए पेड़ों से फल और फूल की अपेक्षा करना ही बेमानी है।

शिल्पा रोंघे

Thursday, May 7, 2020

मन की भूमि

सीलन लगे गोदाम में अनाज रखा नहीं रखा जाता,

जब लग जाए लोहे को जंग तो  इस्तेमाल

उसे औजार में किया नहीं जाता।

तो फिर क्या रुखे सूखे मन से

कोई काम किया सकता है भला ?

मन की बंजर भूमि को सींचते रहिए खुद ही,

हमेशा बारिश के इंतज़ार में वक्त बर्बाद

नहीं किया जाता।

शिल्पा रोंघे


Tuesday, May 5, 2020

बुद्ध पूर्णिमा के लिए

करूणा और धैर्य सिखला गये,

तलवार के दम पर दुनिया जीतने

वाले सम्राट को तुम शांति का दूत बना गए।

मिला बोध वृक्ष की छांव तले

तो सिद्धार्थ से बुद्ध

हो गए।

अपनी मंद मुस्कान से

क्रोध करने वाले को

भी संयम का पाठ पढ़ा गए।

शिल्पा रोंघे

 

 

 

 


Monday, May 4, 2020

शहादत


नमन है उन वीर जवानों को जो जान हथेली पर लेकर चलते हैं।
देश की रक्षा के लिए प्राण अपने न्यौछावर करते हैं।


Sunday, May 3, 2020

वक्त का फ़ैसला


वक्त ना कभी ठहरा है ना ठहरेगा
रुक भी जाए अगर दीवार पर टंगी हुई घड़ी,
फिर भी होता वक्त पर अंधेरा और उजाला है।
उसके फ़ैसले को कहां कोई बदल
पाया।
स्टेशन से छूटी ट्रेन भी
रुक जाती है जंजीर के खींचने से,
लेकिन वक्त तो गूंगा और बहरा है
वो कहां किसी के हिसाब से चलता  है
उसकी अपनी ही रफ़्तार है
और अपनी है एक चाल है।
शिल्पा रोंघे


Saturday, May 2, 2020

हास्य दिवस

नहीं पता क्या रंग होता है ख़ुशी का,
लेकिन ख़ुशमिज़ाज होता है वो इंसान जिसने थाम लिया
हाथ हंसी का।

शिल्पा रोंघे 

Friday, May 1, 2020

सफाई कर्मियों का आभार

अपने घर की सफाई तो सभी करते है।
किरदार तो वो महान है जो दूसरों का फैलाया हुआ कचरा उठाते है।
शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...