आजकल चांदी का नारियल सोने की सुपारी और हीरे का पानदान देखकर रिश्ता तय होता है ना की खानदान देखकर।
I like to write Hindi poetry in comprehensive language, which try to depict different situation and state of mind of human beings. All Rights reserved ©Shilpa Ronghe
Wednesday, January 31, 2024
Saturday, January 27, 2024
काबिलियत
काबिलियत बनाने की पहली सीढ़ी है किताब, मगर काबिल इंसान बनने की आख़री सीढ़ी है तुम्हारा अनूठा हुनर।
Friday, December 29, 2023
आत्ममुग्धता
खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हैं कुछ लोग,
श्रेष्ठ लोगों से ज्यादा, दुनिया को श्रेष्ठ बनाने वालों की ज़रूरत है.
आत्ममुग्धता अब चलन बन चुकी है.
शिल्पा रोंघे
Wednesday, December 27, 2023
ना अब कोई
ना अब कोई बेरोजगारी पर लिखता है.
ना अब कोई बढ़ती आबादी या घटते संसाधन पर लिखता है.
ना अब कोई भाई -भतीजावाद
पर लिखता है ना भाषावाद पर लिखता है.
ना अब कोई
महिलाओं की
की तरफ हो रहे ज़ुल्म पर लिखता है.
क्या बाजार में अब कलम सोने की और कागज़ रेशम का मिलता है?
शिल्पा रोंघे
Sunday, March 7, 2021
नारी दिवस
गुलाब की पंखुडियों सी नाज़ुक भावना रखती हूं।
Friday, March 5, 2021
इंसानियत की ऐसी मिसाल
लौ से लौ जलती है
बुझती नहीं।
गलती अपनी हो तो रिहाई चाहिए।
किसी और कि हो तो कैद चाहिए।
कोशिश हो ऐसी कि
बात हमेशा बराबरी की होनी चाहिए।
इंसानियत की ऐसी मिसाल हर
रोज पेश होनी चाहिए।
शिल्पा रोंघे
Wednesday, March 3, 2021
इंसानियत
जानवरों के जंगल में एक इंसान का मिलना भी खबर,
और इंसानों की बस्ती में जंगल से जानवर का आना भी खबर।
काश इंसानों की बस्ती में इंसानियत का मिलना भी इक दिन बने ख़बर।
शिल्पा रोंघे
मेघा
देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस फिर से, ...
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देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस फिर से, ...
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हम भी किसी का पहला और आखिरी प्यार होते, हम भी किसी का पहला और आखिरी ख़त होते, अगर हम भी दौलत वाले और खूबसूरत होते।
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मैं जानती हूं कि आए थे तुम मेरे शहर... जिसे मुझसे दूर ले गई थी रोजी रोटी की तलाश.... वो मेरी सौत सी गुज़र बसर उसी श...