शिकायत कम, सुलह ज्यादा होती है।
स्वार्थ कम, त्याग ज्यादा होता है।
मनमुटाव कम और
सामंजस्य
ज्यादा होता है।
हमेशा तो नहीं, लेकिन रिश्ता वही
ज्यादातर सफल होता है जो बराबरी में होता है।
शिल्पा रोंघे
I like to write Hindi poetry in comprehensive language, which try to depict different situation and state of mind of human beings. All Rights reserved ©Shilpa Ronghe
शिकायत कम, सुलह ज्यादा होती है।
स्वार्थ कम, त्याग ज्यादा होता है।
मनमुटाव कम और
सामंजस्य
ज्यादा होता है।
हमेशा तो नहीं, लेकिन रिश्ता वही
ज्यादातर सफल होता है जो बराबरी में होता है।
शिल्पा रोंघे
अब महल भी होंगे,खिड़कियाँ भी होंगी
लेकिन साफ
साँसें
नहीं होंगी।
रंग-बिरंगे छाते भी होंगे बाजार में,
लेकिन बारिश कम होगी।
पशु-पक्षी करेंगे इंसानी बस्ती का रुख,
ख़ौफ़ में मानव यहाँ-वहाँ दौड़ेंगे।
जब नहीं बचेंगे जंगल, तब तवे सी तपेगी धरा,
हम तो सुख-सुविधाओं में रहेंगे, लेकिन
गायब हो जाएगी अगली पीढ़ी, तो क्या
यही है
कलियुग
में सफलता की सीढ़ी।
दुनिया के कयासों पर नहीं, सिर्फ अपने प्रयासों पर ध्यान दो, क्योंकि सिर्फ यही तुम्हारे बस में है।
आजकल चांदी का नारियल सोने की सुपारी और हीरे का पानदान देखकर रिश्ता तय होता है ना की खानदान देखकर।
काबिलियत बनाने की पहली सीढ़ी है किताब, मगर काबिल इंसान बनने की आख़री सीढ़ी है तुम्हारा अनूठा हुनर।
खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हैं कुछ लोग,
श्रेष्ठ लोगों से ज्यादा, दुनिया को श्रेष्ठ बनाने वालों की ज़रूरत है.
आत्ममुग्धता अब चलन बन चुकी है.
शिल्पा रोंघे
ना अब कोई बेरोजगारी पर लिखता है.
ना अब कोई बढ़ती आबादी या घटते संसाधन पर लिखता है.
ना अब कोई भाई -भतीजावाद
पर लिखता है ना भाषावाद पर लिखता है.
ना अब कोई
महिलाओं की
की तरफ हो रहे ज़ुल्म पर लिखता है.
क्या बाजार में अब कलम सोने की और कागज़ रेशम का मिलता है?
शिल्पा रोंघे
देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस फिर से, ...