Monday, December 31, 2018

2018 की अंतिम रात्रि और नवीन वर्ष की बढ़ता कदम

चंद्र की शुभ्र किरणें
ले रही विदा दुल्हन 
की तरह.

रात्री की डोली में
बैठकर उन्हें 
सूर्योदय के घर 
जाना है.

तम तो प्रकाश
तक जाने का प्रतिदिन 
का साधन है.

किंतु आज पिछले बरस को
सबको नवीन
वर्ष से मिलवाना
है.

शिल्पा रोंघे 

Sunday, December 30, 2018

तितली

कविता - तितली

क्या वो होली खेलती
है,
या इंद्रधनुष को पंखों
में समेट लेती है, जो
भी हो तितली की चंचलता
और सुंदरता सबका मन मोह
लेती है.

पराग की मिठास उसके
रूप में झलकती है.

फूलों से नाता है पिछले जन्म
का शायद कोई, इसलिए हर
बाग को अपना घर ही समझती
है.

मानव मन को खूब भाती है.
कहां हाथ वो किसी के आती है, हथेली से फिसले जल की तरह झट से उड़ जाती है.

शिल्पा रोंघे

Saturday, December 29, 2018

गुमनाम ही रहने दो

गुमनाम ही रहने दो मुझे.
अपनों के दिल में जगह नहीं 
बना पाया, तो क्या करूं 
मैं मशहूर होके.

शिल्पा रोंघे

नवीन वर्ष क्या कहता है.

वहीं खड़े है वृक्ष सभी तनकर.

वहीं खिल रहे है फूल सुंगध फैलाकर.

सदियों से वहीं खड़े पर्वत विशाल.

उसी समुद्र में जाकर मिल रही तरंगिणी.

उसी डाल पर बैठा है पक्षी घरौंदा बनाके,

उसी नभ में उड़ रहा है पंख फैलाकर.

कुछ नहीं बदलता नवीन वर्ष के साथ 
हां बस संकल्प निश्चित ही हो जाते है दृढ़.

बीते वर्ष में मिली सीखें मानो 
बन जाती है, नवीन वर्ष के जीवन का पाठ.

शिल्पा रोंघे 












Friday, December 28, 2018

बस यहीं पर चूक गए

चेहरा हो तो पढ़ भी लें.
लगा हो मुखौटा तो फिर कोई क्या करें ?

शिल्पा रोंघे 

प्रेरणा के दीप

सूख गए है मेरे रचना स्त्रोत.
 
कोरा रह गया पन्ना ज़िंदगी 
का मेरा.

स्याही तो है मगर अब वो 
सुनहरे विचार नहीं.

आ जाओ मेरे मन मंदिर 
में प्रेरणा के दीप जलाओ ना .

शिल्पा रोंघे 

रॉक गार्डन पर कविता

फ़र्क बस नज़रिये का था.

टूटी हुई चीज़ समझकर बेज़ान 
मान लिया गया.

इक शख़्स ने जोड़ जोड़कर मुझे 
खूबसूरत बागीचा बना लिया.

शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...