खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हैं कुछ लोग,
श्रेष्ठ लोगों से ज्यादा, दुनिया को श्रेष्ठ बनाने वालों की ज़रूरत है.
आत्ममुग्धता अब चलन बन चुकी है.
शिल्पा रोंघे
I like to write Hindi poetry in comprehensive language, which try to depict different situation and state of mind of human beings. All Rights reserved ©Shilpa Ronghe
खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगे हैं कुछ लोग,
श्रेष्ठ लोगों से ज्यादा, दुनिया को श्रेष्ठ बनाने वालों की ज़रूरत है.
आत्ममुग्धता अब चलन बन चुकी है.
शिल्पा रोंघे
ना अब कोई बेरोजगारी पर लिखता है.
ना अब कोई बढ़ती आबादी या घटते संसाधन पर लिखता है.
ना अब कोई भाई -भतीजावाद
पर लिखता है ना भाषावाद पर लिखता है.
ना अब कोई
महिलाओं की
की तरफ हो रहे ज़ुल्म पर लिखता है.
क्या बाजार में अब कलम सोने की और कागज़ रेशम का मिलता है?
शिल्पा रोंघे
गुलाब की पंखुडियों सी नाज़ुक भावना रखती हूं।
लौ से लौ जलती है
बुझती नहीं।
गलती अपनी हो तो रिहाई चाहिए।
किसी और कि हो तो कैद चाहिए।
कोशिश हो ऐसी कि
बात हमेशा बराबरी की होनी चाहिए।
इंसानियत की ऐसी मिसाल हर
रोज पेश होनी चाहिए।
शिल्पा रोंघे
जानवरों के जंगल में एक इंसान का मिलना भी खबर,
और इंसानों की बस्ती में जंगल से जानवर का आना भी खबर।
काश इंसानों की बस्ती में इंसानियत का मिलना भी इक दिन बने ख़बर।
शिल्पा रोंघे
किसी की लिखी कृति में जबरन खुद को बैठाने की
कोशिश ना करे, खुद भी चैन से रहिए और दूसरों को भी रहने
दें।
शिल्पा
सदियों बाद
अपने अधिकारों को लेकर
जागी है,
वो तन के अलावा
मन भी रखती है।
कभी समाज की बेड़ियों से मुक्त होने के
लिए लड़ती है तो कभी दबे कुचले अधिकारों
की बात करती है।
पुरूष की परछाई बनकर रहे
आजीवन क्या वही औरत
कहलाने का दर्जा रखती है
ऐसे कई सवाल खड़े करती है।
जो आज की औरत है
क्या सही है या गलत
है उसके लिए
ये अगर सोचने की आजादी
रखती है तो कौन सी ऐसी भूल करती है।
शिल्पा रोंघे
देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस फिर से, ...