Tuesday, January 22, 2019

अनकहे ज़ज्बात

अनकहे ज़ज्बातों की दुनिया 
बड़ी ख़ामोश होती है.

ज़ुबा कुछ कहती नहीं पर
पत्तों और हवा की जुगलबंदी 
कुदरत के गीत सुनाती है.

महकते फूलों पर भंवरों का गुंजन 
सात सुरों सा अहसास कराता है.

शिल्पा रोंघे 

Monday, January 14, 2019

कविता- मकर संक्रांति

हल्दी और कुमकुम का टीका
लगाकर हो 
शुभारंभ.

तिल और गुड़ 
की मिठास 
वाणी में जाए घुल.

सुगंधित सुमन 
से सुवासित हो मन
मंदिर.

अनंत आकाश 
में अपना अस्तित्व 
दर्ज कराए 
रंगबिरंगी पतंग.

धनु राशि से मकर 
में जब हो सूर्य 
का आगमन 
तब मानते सभी 
मिल जुलकर 
मैत्री और सौहार्द का सूचक संक्रान्ति का पर्व.

शिल्पा रोंघे 

Wednesday, January 9, 2019

विश्व हिंदी दिवस

अनुशासित व्याकरण,
सहज शब्दावली,
देवनागरी लिपि 
में लिखी भाषा 
हमारी.

कश्मीर से कन्याकुमारी 
तक है  प्रसार इसका.

लांघ कर सीमा 
देश की हुआ प्रचार इसका.

फिजी, नेपाल, त्रिनिदाद टोबैगो,
मॉरीशस, सूरीनाम में फहराया 
परचम भारतीय संस्कृति का.


संस्कृत की ये बेटी पढ़ाती 
सबको एकता का 
पाठ.

विदेशी भाषा के बिना 
विदेशी संस्कृति को 
जान पाना नहीं आसान,
वैसे ही अधूरा हिंदी के बिना देश 
की संस्कृति, समाज, इतिहास, मानसिकता का 
पूरा और सटीक ज्ञान.

शिल्पा रोंघे 


Friday, January 4, 2019

मुश्किल कहानी

मुश्किल है बेकल सी धड़कनों
को सुनना,
जितना की पानी पर
कहानी लिखना.

शिल्पा रोंघे

वक्त का तकाज़ा

कौवे से नाराज़गी 
रखकर क्या करेगी
"कूक"
वसंत के फूल ही 
परिचय देंगे 
कोयल का.

शिल्पा रोंघे

Wednesday, January 2, 2019

कबूतर की कहानी


गुज़रा ज़माना अब भी भाता है.
पुरानी सी हो रही इमारतें
दिखती हैं जहां, बसेरा बना लेते हैं.
सन्नाटें को चीरती हुई गुटर गूं
हमारी.
देखा इतिहास कई पीढ़ियों ने हमारी.
पैरों में बंधे ख़त से लेकर मोबाइल के टावरों तक का ज़माना तय किया है हमने.

शिल्पा रोंघे

Tuesday, January 1, 2019

कविता - उड़ने दो पंछियों को

बंद पिंजरे में कैद तोता 
बोला यूं ही रट्टू में "तोता"
और अपने मुंह 
मियां में "मिट्ठू"
जोड़ दिया,
पोपटी रंग के लिए
मेरा उदाहरण 
दिया.

बैठता था अमरूद खाने 
डाल पर.
कहां फ़ुरसत थी पेड़ों 
पर घोंसला बनाने से.

उड़ने दो, हरे भरे पंख 
फैलाने दो नीले गगन 
में.

मानव की बस्ती में 
मन नहीं लगता.
एक कटोरे 
पानी का और कुछ आम,
हरी मिर्ची का लालच 
भी मुझे पिंजरे से प्रेम 
करने को मज़बूर नहीं 
करता.

शिल्पा रोंघे 

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...