यूं
ही नहीं होता नाराज़ किसी से कोई,
ज़रुर
उस बेरुख़ी के पीछे कोई तो वजह होगी।
गर
करती होगी कुदरत मनमानी,
तो
ज़रुर इसके पीछे इंसान की ही खुदगर्ज़ियां छिपी होंगी।
शिल्पा
रोंघे
I like to write Hindi poetry in comprehensive language, which try to depict different situation and state of mind of human beings. All Rights reserved ©Shilpa Ronghe
यूं
ही नहीं होता नाराज़ किसी से कोई,
ज़रुर
उस बेरुख़ी के पीछे कोई तो वजह होगी।
गर
करती होगी कुदरत मनमानी,
तो
ज़रुर इसके पीछे इंसान की ही खुदगर्ज़ियां छिपी होंगी।
शिल्पा
रोंघे
पूरा वक्त आत्ममंथन को ही दे देती हूं।
तो मेरा मुकाबला मुझ से ही होता है हर रोज।
हां प्रतिस्पर्धा मैं खुद से ही करती हूं,
खुद ही अपनी कमियां गिनती हूं और दूर करती हूं।
इस तरह वाद- विवाद से खुद
को दूर रखती हूं।
शिल्पा रोंघे
मेरी वजह से दिल ना
दुखे किसी का ये ज़रुरी है,
लेकिन अपने दिल की
सेहत का ध्यान रखना तो सिर्फ मेरी
ही जिम्मेदारी है।
कोई मुझे पसंद करता है
या नहीं, इसकी फ़िक्र
करना मेरा काम नहीं, क्योंकि इंसान
की ज़िंदगी
की मियाद सदियों सी
लंबी होती नहीं है।
नदी की तमन्ना........
सात समंदर में से उस समंदर मिल जाना है,
जिसकी सीप भी मैं, मोती भी मैं
साहिल भी मैं और लहरों में उठने वाली मौज भी मैं।
बूंदों से बनने वाला संगीत भी मैं।
और हां सागर की आखिरी प्रीत भी मैं।
मध्यम वर्ग अब खेत जोतने
वाले उस बैल की तरह बन
चुका है, जिसे पसीना बहाते हुए कर्तव्य तो निभाना है, लेकिन अपने अधिकारों की बात पर गुपचुप बैठ जाना है।
संस्कारों की पाठशाला में पढ़ने वाला बच्चा अब नैतिक शिक्षा के मायने ढूंढने में लगा है।
बिना शोर मचाए तिनके के सहारे तैरने लगा है, अंजान मंजिल की आस में
क्योंकि वो इसे ही अपनी नियती मान चुका है।
शिल्पा रोंघे
देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस फिर से, ...