Saturday, December 30, 2017

धर्म

कोई भी धर्म बांटने का काम कतई नहीं करता
बल्कि जीना सीखता है चाहे कोई भी हो.
वेस्टर्न कल्चर के प्रभाव में लोग धर्म को भूलते
जा रहे है.
अपना धर्म मानना शर्म नहीं कर्म का प्रतीक है.

शिल्पा रोंघे

Friday, December 29, 2017

दिलवाले का दौर

ये दौर दिलवालों का नहीं है.
ये दौर है दिमाग से सोचने वालों का.
गर लेना हो ज़िंदगी का कोई अहम फ़ैसला तो
दिल से पहले दिमाग की राय लेना मत भूलना.

शिल्पा रोंघे

नया साल

झड़ने दो पुराने पत्तों को.
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गिरने दो फूलों को जमीं पर.
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कि नए पत्ते फिर आएंगे शाखों पर.
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कि नए फूल फिर उगेंगे डाली पर.
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ताकेंगे आसमान की ओर.
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गिरने से मत डरो, झड़ने से ना डरो.

बीज भी जमीन में गिरकर ही पौधे
बन जाते है फिर पेड़ का रूप ले
लेते हैं.
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नए साल का जश्न भी हम नएपन के
साथ मनाएंगे.

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शिल्पा रोंघे

शम्मा की कहानी

सिर्फ लौ के सहारे जलती है शम्मा
उजाला देती है शम्मा.
पंख वाला है परवाना

उड़ सकता है वो आजादी से ना जाने कहां कहां.
हां मडराता है वो जलती शम्मा के ईर्द गिर्द
लेकिन शम्मा के नसीब में उड़ना नहीं सिर्फ जलना
है लिखा.

पंखों के सहारे खिलती है कली बाग में.
फूल बनकर बिखेरती है खूशबू.

पंख वाला है भंवरा.
उड़ सकता है आजादी से वो ना जाने कहां कहां.
हां मंडराता है वो हर खिलती कली के ईर्द गिर्द

लेकिन कली केे नसीब में उड़ना नहीं सिर्फ खिलना है लिखा.
फिर भी ना जाने क्यों लिखनें वालों ने बस कभी
भंवरे तो कभी परवाने की तारीफ़ में ही सब कुछ लिखा.

शिल्पा रोंघे

Thursday, December 28, 2017

दौलत की ख़्वाहिश नहीं

ना दौलत की ख़्वाहिश रखें.
ना शोहरत की चाह रखें.
कोई सिर्फ वफ़ा के बदले वफ़ा
की हसरत रखे.
बदले में अगर उसे ये भी ना मिले तो
कितनी भी सुनहरी हो मोहब्बत
कोई भला क्यों उसे मंज़ूर करें ?
शिल्पा रोंघे

प्रेम को बदनाम ना कर

प्रेम को तो यूं ही बदनाम करते है लोग
प्रेम तो जीवन है, जीवन था और रहेगा.
लालची और स्वार्थी
प्रेम इनके बस की बात नहीं.
हां बस प्रेम का नाम बदनाम करना
इनका काम है यही.
शिल्पा रोंघे

Wednesday, December 27, 2017

सुधार की कैसी चाह

है जुटे हुए कुछ लोग
सुधार में.
है जुटे कुछ लोग आधुनिकता
की दुहाई देकर पंरपराओं को
प्राचीन बताने में.

तो कुछ पंरपराओं की आड़ लेकर
बदलाव को ठुकराने में.

है जुटे हुए कुछ लोग
अपनी ही बात सही मनवाने में.

उनकी इच्छाओं का नहीं कोई
अंत, सिर्फ इसलिए जुटे है वो दूसरों का
हक छीनने में जिसके वो अधिकारी हैं.

सच से लगता है उन्हें डर इसलिए झूठ
का चमकता चोला वो पहने हुए.
तो कभी सफेदपोश के रूप में.

हां जुटे है कुछ लोग अपने ही झूठ
को सच बताने में, और सच को दबाने
में.

शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...