Monday, September 19, 2016

कविता- तेजाब

मेरा नहीं तो 
किसी का नहीं
सोच के यहीं
उस तेजाब ने
मोहब्बत के
जूनून की
काली छाप
छोड़कर
झूठे
गुरुर की
आग
ठंडी कर दी
भूल गया था
वो शायद
अपने वजूद
को ही
जो मोहब्बत
की ही निशानी था.
नफ़रत तो मौत
से भी बद्तर
निशान दिल
पर है छोड़ती
शिल्पा रोंघे

दिल की बाजी

ना खेल ज़ज्बातों से किसी के 
इतना भी 
ये शतरंज का खेल नहीं
रिश्तें हैं.
दिल की बाजी दिमाग 

से तेजी से पलटती हैं
कहीं किसी दिन
चाल चलते चलते
खुद ही मोहरा
ना बन जाओ
तुम कहीं.

शिल्पा रोंघे

Tuesday, August 30, 2016

नामुमिकन काम

कहते है सभी इश्क दो जुदा दिलों
को जोड़ने का काम करता है.
पर कभी कभी ये 
दो दिलों को तोड़ने 
की ख़ता भी कर जाता है
जैसे दवा सही हो तो
जान बचा लेती है
गर हो गलत
तो जान भी ले लेती है.
उपरवाले की बेरुखी
और मेहरबानी
के खेल 
को जान 
पाना सचमुच नामुमिकन 
काम है
शिल्पा रोंघे

Sunday, August 28, 2016

वादों की क्या औकात.

ना करना कभी वादों पर जरूरत से ज्यादा ऐतबार
जब पाक किताबों पर रखकर हाथ झूठी
कसमें खा लेते है लोग. 
तो फिर वादों की क्या औकात.

शिल्पा रोंघे.

Tuesday, August 23, 2016

लगता है यूं भी कभी कभी

लगता है यूं भी कभी कभी
इस दुनिया में ज़ज्बात
धुआं बनकर उड़ गए है.
शायद आसूंओं के जो
थे दरिया आंखों में वो सूख
गए है अभी
थोड़ा तुम और थोड़ा
हम शायद पत्थर दिल
बन गए है.
चलों यूं करते है
रख देते है
इन्हे अपनी हथेली
पर एक साथ
कभी
फिर देखेंगे
होता है
क्या भड़केगी
नफ़रत की चिंगारी
या
फिर जल उठेगा
प्यार का दिया
गलती से कभी
चलोें छोड़
देते है अंजाम
होगा क्या
दो दिलों पर
ही
और चुप रहते है
हम दोनों अभी.
शिल्पा रोंघे

Wednesday, August 10, 2016

तुम से मिलकर





एक पल लिए भी तुम से मिलकर जो 
मर भी जाते तो जैसे सौ साल 
जी जाते 
दिल तो सब जानता है 
कि इक इक पल भी लगते है 

भारी ऐसे जैसे सौ साल है गुजारे
बोझ सी जिंदगी कटती नहीं बिन तुम्हारे
सौ साल की जिंदगी नहीं
चाहते है हम
बस काश कुछ पल गुजार लेते हम साथ तुम्हारे
तो उन पलों में ही सौ साल पूरे हो
जाते हमारे 

शिल्पा रोंघे.

Tuesday, August 9, 2016

धोखे की नींव

धोखे की नींव पर बने रिश्ते
जैसे बिना बुनियाद का मकान
हल्का सा हवा का झोका भी
कर दे जिसका काम तमाम
भरोसे की नींव पर बने रिश्ते
जैसे समुंदर में चट्टान
जिससे टकराकर लौट जाते
ना जाने कितने तुफान 

शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...