Monday, November 26, 2018

हर दिन उत्सव

मानो तो हर दिन उत्सव है जिंदगी
ना मानो तो कुछ भी नहीं.

कोई रिश्ता, कोई उपलब्धि
खुश नहीं कर सकती.
जब तक अंतरआत्मा संतुष्ट नहीं.

किसी को खुद के बारे में
सोचकर खुशी मिलती है,
तो किसी को खुशियां बांट कर मिलती
है.

फर्क सिर्फ नज़रिये का.
वरना हर कोई खरीद
लेता खुशियों को.

शिल्पा रोंघे

Sunday, November 25, 2018

वो जो लोग

जमीन पर भी पैर संभाल कर रखा 

करते है, कहीं मैले ना हो जाए कदम.

सांस भी संभालकर लिया करते 

है.

ना सूरज की रोशनी 

में खुद को तपने देते 

है.

पानी भी सोच समझकर पीते है.

वो जो लोग बड़ी बड़ी 

बातें किया करते है,

क्या सचमुच जमीन

से जुड़े होते है.

क्या जो वो कहते है 

खुद  भी अमल 

में लाते हैं ?

शिल्पा रोंघे 

दिल का मुखौटा

दिल का मुखौटा 

लगाकर वो दिमाग 

वाली बातें किया 

करते है.

हम भी नादान 

इतने दिमाग को 

अनसुना करके 

दिल से उनकी बातों 

पर यकीं किया करते 

है.

शिल्पा रोंघे 

परिपूर्ण कोई नहीं

परिपूर्ण कोई नहीं
है दुनिया में,

दो अपूर्ण ही
एक पूर्ण बनाते
है.

संपूर्णता की तलाश
यानि ईश्वर की
खोज है.

रचयिता ने
जानबूझकर कुछ
कमियां, और खामियां
छोड़ी है.

वरना इंसान को
एक दूसरे की जरूरत
ही नहीं होती.
ना दुनिया होती,
ना हम और ना तुम होते.

शिल्पा रोंघे

Saturday, November 24, 2018

सोचा था यूं

सोचा था घर बनायेंगे 

दिल में उनके भी,

उनको समुंदर 

खुद को किनारा

समझ बैठे.

भूल गए थे शायद

रेत के घर लंबे 

नहीं टिका करते.

मुसाफ़िर लहरों 

से दिल लगाया 

नहीं करते.

शिल्पा रोंघे


कब होगा ये सिलसिला ख़त्म

तेरे ख्यालों 

से दिन शुरू 

होता है,

 तेरे ख्यालों 

से दिन ढलता 

है.

रात भी चैन

से सोने नहीं 

देती.

ना जाने क्यों ख़्वाबों 

में भी तेरा बसेरा

रहता है.

कहने लगे है लोग

अब तो जिस दिन 

मेरा दम निकलेगा 

उस दिन ही ये किस्सा 

खत्म होगा.

तुम ही बता दो 

कि ज़हन से 

तुम्हारा ख़्याल 

कब निकलेगा ?

शिल्पा रोंघे 

पेन्सिल की कहानी

पेन्सिल की
कहानी

कई किरदार गढ़े
अब तक कविता
और कहानी में,
कल्पना में रंग भरते भरते.
कोरे कागज पर लफ़्ज
बनाते बनाते हर रोज
कद में कम होती रहती
हूं.
हमेशा नए किरदार
गढ़ती हूं कहानी
में, सोचती हूं
शब्द तो
अमर हो जाते है.
मेरा वजूद कहां
है?
शिल्पा रोंघे

मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...