Thursday, July 4, 2019

नया दौर

रूचि, मेहनत और तर्क का मेल है
नए वक्त की ज़रूरत.

शिल्पा रोंघे 

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मेघा

देख रहे हैं राह, बचे-खुचे कुछ जंगल। अब तो निमंत्रण स्वीकार कर। सूख रही हैं नदियाँ और ताल, फिर से बह कर कहीं दूर निकल चल। मेघा, बरस  फिर से, ...